फरीद खान
पर्यूषण पर्व (दशलक्षण) के दसवें एवं अंतिम दिन जैन मंदिरों में वासुपूज्य भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया और निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म को आत्मसात करने का संकल्प लिया। अनंत चतुर्दशी का उपवास रखा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान किया।10 सितंबर से पर्व शुरू हुआ था। अनंत चतुर्दशी को दशलक्षण पर्व का समापन हुआ। सुबह से ही श्रद्धालु श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पहु़ंचने लगे थे विधि-विधान के साथ अभिषेक और पूजन किया वैसे तो दशलक्षण पर्व के दस दिन तक काफी लोग व्रत करते हैं और 24 घंटे में एक बार ही भोजन-पानी ग्रहण किया जाता है, लेकिन जिन्होंने व्रत नहीं रखे थे, उन्होंने भी रविवार को व्रत किया।ब्रह्मचर्य पवित्र रहने का गुण है। हमें काम, क्रोध, द्वेष, ईष्र्या आदि से खुद को दूर रखना चाहिए। आत्मा में रमना और रहना ही उत्तम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य धर्म आग को पानी और शैतान को इंसान बनाता है। हमें अपनी इच्छाशक्ति का भी मजबूती के साथ पालन करना चाहिए। इसके लिए मन का नियंत्रण में रहना बहुत जरूरी है। पर्यूषण पर्व मोक्ष मार्ग का अनुगामी बनाता है। हमारी आतंरिक शुद्धि होती है। तपस्या, ज्ञान और संयम की जड़ ब्रह्मचर्य ही है। एक तरह से पर्यूषण पर्व प्रतिवर्ष हमारे भीतर दया, क्षमा और मानवता को जगाता है। लोकेश धनोप्या ने बताया की प्रथम शांतिधारा पुण्यार्जक राजेंद्र हरसौरा, श्रेयांश हरसौरा रहे।द्वितीय शांतिधारा पुण्यार्जक चांदमल जी हरसौरा, राहुल हरसौरा, रोमिल हरसौरा रहे।दशलक्षण कलश पुण्यार्जक गुलाब हरसौरा रहे।दशलक्षण माल के पुण्यार्जक विमल धनोप्या, पूर्वांश धनोप्या रहे शाम को सामूहिक क्षमावाणी पर्व मनाया गया।

