झालावाड़:- भारत सरकार, राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण विकास के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायतों की इतनी बड़ी राशि दी जाती रही है की संभवतया भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ी होती है। गांवो की स्थिति कुछ और होती लेकिन अब गांवो की युवा पीढ़ी जागृत होने लगी तो भ्रष्टाचार के प्रकरण भी सामने आने लगे।
सूचना के अधिकार के तहत पंचायती राज विभाग के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतें सूचना देने में इसलिए कतराती है कि कहीं भाण्डा ना फूट जाये, हाँ बहाने बाजी, आरोप लगाने में पीछे नहीं हटते। हाल में इकलेरा की ग्राम पंचायत बोरबन्द के लोक सूचना अधिकारी जगदीश मीणा ने गलती से गलत सूचना तो दे दी लेकिन उस में फंस गया। नियमानुसार ग्राम पंचायत में कार्य करवाने के लिए दस हजार रुपये कार्य पर सेशन लेनी पड़ती है। ऐसे में सरपंच ही जीएसटी नंबर लेकर अपने बिल स्वयं काट लेते हैं। आईटीआई कार्यकर्ता ने बताया कि उसे करीब एक दर्जन बिल ऐसे मिले हैं जिसमें ग्रेवल के नाम पर भारी राशि उठाई गई। सारे बिल नौ हजार से दस हजार की राशि व एक जैसे क्रमानुसार है।
सूत्र बताते हैं कि
ग्रेवल उठाने के लिए माइनिंग विभाग की परमिशन लेनी पड़ती है जिसे नहीं ली गई। उसके पश्चात टैक्स है, ग्रेवल के बिल पर 5 प्रतिशत टैक्स है तथा बिल पर मिट्टी बिछाने का स्थान लिखा गया है तो वह सर्विस के दायरे में आता है। जिस पर 18 प्रतिशत टैक्स है। हालांकि जांच का विषय है किंतु ग्राम विकास अधिकारी द्वारा बिना सोचे समझे बिलों का भुगतान कर दिया। जिसकी जांच होना लाजमी है।
हम भ्रष्टाचार पर समाचार लिखते हैं जनता व प्रशासन को अवगत करवाते जांच होना नहीं होना अलग विषय होता है। ऐसे भ्रष्टाचारी कर्मचारी दिन रात कई तरह के आरोप लगाते उससे सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सच सामने लाना हमारा कर्तव्य है जिससे कभी पीछे नहीं हटेंगे। खास बात तो यह है आरोप लगाने वालों को मेरा नाम भी ठीक से पता नहीं है।
मैंने दिसंबर में कार्यभार संभाला है, इसकी जानकारी पूर्व विकास अधिकारी चिराग दे सकता है।
जगदीश मीणा
ग्राम विकास अधिकारी
ग्राम पंचायत बोरबंद
पंचायत में सामानों की सप्लाई मेरी फर्म द्वारा ही होती है।
घनश्याम
सरपंच
ग्राम पंचायत बोरबंद

